Tomato (टमाटर)

Basic Info : 

टमाटर (Tomato) की उत्पत्ति सबसे पहले दक्षिण अमेरिका के पेरू में हुई है। यह भारत की महत्वपूर्ण व्यावसायिक सब्जी फसल बन गयी है। यह आलू के बाद दुनिया की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। टमाटर के फल कच्चे या पके हुए रूप में खाए जाते हैं। यह विटामिन ए, सी, पोटेशियम और खनिजों का समृद्ध स्रोत है। इसका उपयोग सूप, जूस और केच अप, पाउडर में किया जाता है। प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं। भारत के हर राज्य में बोई जाने वाली फसल है।

Seed Specification : 


टमाटर की किस्में
देसी किस्म - पूसा रूबी, पूसा-120, पूसा शीतल, पूसा गौरव, अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली
संकर किस्म - पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड-4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535 उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस.440 आदि।

नर्सरी प्रबंधन
टमाटर के बीजों को सीधे खेत में न बोते हुए पहले नर्सरी में बोया जाता है, जब पौधे 4 से 5 सप्ताह अर्थात 10 से 15 सेंटीमीटर के हो जाएँ तब इन्हें खेत में प्रतिरोपित करते हैं। नर्सरी तैयार करना टमाटर नर्सरी के लिए 10 से 15 सेंटीमीटर उठी हुई क्यारियाँ बनानी चाहिये ताकि क्यारी में आवश्यकता से अधिक पानी न रूके। क्यारियाँ किसी भी दशा में 90 से 100 सेंटीमीटर (एक गज या एक मीटर) से अधिक चौड़ी न हों अन्यथा निराई-गुड़ाई, बीज बुआई या सिंचाई करने में असुविधा हो सकती है। नर्सरी में 4 सेमी की गहराई पर बीज बोएं और फिर मिट्टी से ढक दें। 
टमाटर के पौधों की लम्बाई 5 मीटर होनी चाहिये, एक एकड़ के लिए ऐसी 25 क्यारियों की आवश्यकता होती है। बीजों की बुवाई के पूर्व 8 से 10 ग्राम कार्बोफुरान 3 जी प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन में मिलावें और 2 ग्राम केप्टान प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर बुवाई करें। बीजों को 5 से 7 सें.मी फासले पर कतारों में बोया जाता है। जैसे ही बीजों का अंकुरण हो कैप्टान के 0.2 प्रतिशत घोल से क्यारियों का उपचार करें, नर्सरी में पौधों की फव्वारे से सिंचाई करें।

बुवाई का समय
इसकी खेती उत्तरी राज्य के लिए, वसंत के मौसम के लिए टमाटर की खेती नवंबर के अंत में की जाती है और जनवरी के दूसरे पखवाड़े में रोपाई की जाती है। शरद ऋतु की फसल के लिए, बुवाई जुलाई - अगस्त में की जाती है और अगस्त - सितंबर में रोपाई की जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल में बुवाई की जाती है और अप्रैल-मई में रोपाई की जाती है।

बीज की मात्रा
एक एकड़ भूमि में बुवाई के लिए अंकुर तैयार करने के लिए 100 ग्राम बीज दर का उपयोग करें।

बीज का उपचार
फसल को मृदा जनित रोग और कीट से बचाने के लिए, बुवाई से पहले बीज का उपचार थायरम 3 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम बीज के साथ करें। रासायनिक उपचार के बाद बीज को ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम / किलोग्राम बीज से उपचारित करें। इसको छाव में रखें और इसे बुवाई के लिए उपयोग करें।



मिट्टी
टमाटर को विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है जिसमें रेतीली दोमट से लेकर काली मिट्टी और उचित जल निकासी वाली लाल मिट्टी होती है। उच्च कार्बनिक सामग्री के साथ अच्छी तरह से सूखा रेतीली मिट्टी के नीचे उगाए जाने पर यह सबसे अच्छा परिणाम देता है। अच्छी वृद्धि के लिए मिट्टी का पीएच मान 7 से 8.5 होना चाहिए। यह मध्यम अम्लीय और लवणीय मिट्टी को सहन कर सकता है। शुरुआती फसलों के लिए हल्की मिट्टी फायदेमंद होती है जहां भारी पैदावार के लिए दोमट मिट्टी उपयोगी होती है।

भूमि का तैयारी
टमाटर के रोपण के लिए अच्छी तरह से चूर्णित और समतल मिट्टी की आवश्यकता होती है। मिट्टी को बारीक करने के लिए, 4-5 बार के लिए भूमि की जुताई करें, फिर मिट्टी के स्तर को बनाने के लिए प्लैंकिंग की जाती है। अंतिम जुताई के समय अच्छी तरह से विघटित गोबर और कार्बोफ्यूरॉन 5 किग्रा या नीम केक 8 किग्रा प्रति एकड़ की दर से डालना चाहिए।

खाद एवं रासायनिक उर्वरक
टमाटर की खेती के लिए खेत की तैयारी के समय अच्छी तैयार की हुई गोबर की खाद 10 टन प्रति एकड़ डालें और मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। नाइट्रोजन 60 किलो , फासफोरस 25 किलो और पोटाश 25 किलो की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। तथा अन्य उर्वरक और पोषकतत्व मिट्टी परिक्षण के आधार पर ही प्रयोग करें।

प्रमुख कीट एवं रोकथाम:

कीट सफेद मक्खी (व्हाइट फ्लाई) - इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही पत्तों से रस चूसते हैं। इनके द्वारा बनाये गए मधु बिन्दु पर काली फंफूद आ जाती है, जिससे पौधे का प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है। यह कीट वायरस जनित ‘पत्ती मरोड़क’ बीमारी भी फैलाता है।
रोकथाम - रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को आधे घंटे के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मि.ली प्रति 3 लीटर के घोल में डुबोएं।
- नर्सरी को 40 मैश की नाइलोन नेट से ढक कर रखें।
- नीम बीज अर्क (4 प्रतिशत) या डाइमेथोएट 30 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या मिथाइल डेमिटोन 30 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें।

टमाटर फल छेदक (होलीयोथिस) - इस कीट की सुंडियां फलों में छेदकर इनके पदार्थ को खाती हैं, और आधी फल से बाहर लटकती नजर आती हैं। एक सुंडी कई फलों को नुकसान पहुंचाती है। इसके अतिरिक्त ये पत्तों को भी हानि पहुंचाती हैं।
रोकथाम - टमाटर की प्रति 16 पंक्तियों पर ट्रैप फसल के रूप में एक पंक्ति गेंदा की लगाएं।
- सुंडियों वाले फलों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें।
- इस कीड़े की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगाएं।
जरूरत पड़ने पर नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या एन पी वी 250 एल इ प्रति हेक्टेयर या बी टी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या एमामेक्टिन बेन्जोएट 5 एस जी 1 ग्राम प्रति 2 लीटर या स्पिनोसेड 45 एस सी 1 मिलीलीटर प्रति 4 लीटर या डेल्टामेथ्रिन 2 या 5 ई सी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का इस्तेमाल करें।
तम्बाकू की इल्ली (टोबैको कैटरपिल्लर, स्पोडोप्टेरा) - इस कीट की इल्लियां पौधों के पत्तों व नई कोंपलों को नुकसान पहुंचाती हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में पौधे पत्ती रहित हो जाते हैं। ये फलों को भी खाती हैं|
रोकथाम - इल्लियों के प्रकोप वाले पौधों को निकालकर भूमि में दबा दें।
- कीट की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगाएं।
- बी टी 1 ग्राम प्रति लीटर या नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या स्पिनोसेड 45 एस सी 1 मिलीलीटर प्रति 4 लीटर या डेल्टामेथ्रिन 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिडकाव करें।
पत्ती सुरंगक कीट (लीफ माइनर) - इस कीट के शिशु पत्तों के हरे पदार्थ को खाकर इनमें टेढ़ी-मेढ़ी सफेद सुरंगे बना देते हैं। इससे पौधों का प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है। अधिक प्रकोप से पत्तियां सूख जाती हैं।
रोकथाम - ग्रसित पत्तियों को निकाल कर नष्ट कर दें।
- डाइमेथोएट 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर या मिथाइल डेमिटोन 30 ई सी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें।
प्रमुख रोग एवं रोकथाम :
आद्र गलन (डेम्पिंग ऑफ) - यह पौधशाला की सबसे प्रमुख बीमारी है, जो संक्रमित बीज और मिट्टी से पनपता है, जिससे जमीन की सतह पर तना भूरा काला होकर गिर जाता है। अधिक रोग के कारण कभी-कभी पूरी पौध भी नष्ट हो जाती है।
रोकथाम - हमेशा उपचारित बीज ही प्रयोग करें और नयी भूमि में पौध तैयार करें।
- बीज जमाव के पश्चात 2 ग्राम कैप्टान रसायन 1 लीटर पानी में घोलकर फव्वारे से डैचिंग करें।
- यदि उक्त रसायन उपलब्ध न हो तो बाविस्टिन रसायन की 1 ग्राम मात्रा 1 लीटर पानी में घोलकर 1 सप्ताह के अन्तराल पर छिड़काव करते रहें।
- ध्यान रहे कि नर्सरी बेड उठी हुई हो तथा पौधशाला में पौध घनी गहरी न हो।
- पौधशाला में सिंचाई आवश्यकतानुसार ही करें।
अगेती झुलसा - मई से जून माह में पत्तियों में यह रोग दिखाई देता हैं, फलस्वरूप पत्तियाँ पीली पड़कर गिर जाती हैं।
रोकथाम - डाईथेन जेड- 78 का छिड़काव करें (10 लीटर पानी में 20 ग्राम दवा घोलकर)
पछेती झुलसा - यह रोग बरसात के मौसम में लगता है। इसमें पत्ती के किनारे भूरे-काले रंग के हो जाते हैं। प्रभावित फल में भूरे काले धब्बे बनते हैं, फलस्वरूप पत्तियाँ या फल गिर जाते हैं।
रोकथाम - 10 से 15 दिनों के अन्तराल पर मैन्कोजेब या रिडोमिल एम जेड का छिड़काव करें (20 ग्राम दवा 10 लीटर पानी में घोलकर)
पर्णकुंचन व मोजेक (विषाणु रोग) - पत्तियाँ नीचे की तरफ मुड़कर ऐंठ जाती हैं, रोगी पत्तियां छोटी, मोटी और खुरदरी हो जाती हैं। पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है, रोग के उग्र रूप धारण करने पर फूल भी नहीं बनते हैं। यह रोग सफेद मक्खियों के कारण होता है, इसलिये उनका नियंत्रण करना चाहिए।
रोकथाम - इमिडाक्लोप्रिड (100 मिलीलीटर प्रति 500 लीटर पानी) रोपाई के 3 सप्ताह बाद तथा आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर करें।
बकाय रॉट - हल्के और गहरे भूरे रंग के गाढ़े छल्ले फल पर दिखाई देते हैं, ये छल्ले छोटे भी हो सकते हैं या फल की सतह का एक बड़ा हिस्सा ढक सकते हैं। जिसके कारण फल सड़ जाते हैं।
रोकथाम - मेटाटाक्सिल या मेन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ फल लगने पर छिडकाव करना चाहिये।































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